हाई-पेड कॉर्पोरेट नौकरी, टॉक्सिक बॉस और लगातार दबाव ने राकेश बी. पाल को अंदर ही अंदर तोड़ दिया था. उन्होंने कॉर्पोरेट की दुनिया की वो सच्चाई सामने रखी, जो लोग कहने में झिझकते हैं. उन्होंने सुकून पाने के लिए नौकरी छोड़कर ऑटो ड्राइवर बनना चुना.
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