“मेरे तो तीन-तीन डिब्बे घी के महीने में निकल जाते हैं. नौकरों के लिए डालडा रखा हुआ है लेकिन कौन जाने ये मुए हमें डालडा खिलाते हों और खुद देसी घी हड़प जाते हो। आज के जमाने में किसी का एतबार नहीं किया जा सकता. मैं ताले तो नहीं लगा सकती. यह दूसरा नौकर मथरा सात रोटियाँ सवेरे और सात रोटियाँ गिनकर शाम को खाता है और बहन, बीच में इसे दो बार चाय भी चाहिए… और घर में जो मिठाई हो वह भी इसे दो. लेकिन मैं कहती हूँ, “ठीक है, कम से कम टिका तो है, भई आजकल किसी नौकर का भरोसा थोड़ी है। कब कह दे – मैं जा रहा हूँ” ये भी मुझे यही कहते हैं,कुत्ते के मुँह में हड्डी दिए रहो तो नहीं भौंकेगा” – सुनिये भीष्म साहनी की मशहूर कहानी ‘साग मीट’ स्टोरीबॉक्स में @Jamshedhumd से