एक दिन आएगा, जब परिमा को फूलों से डर नहीं लगेगा

एक सीन है जिसे लिखते हुए एकबारगी हम भी हिचके थे. कितनी बातें कीं, कितना सोचा, पढ़ा और सुना और यूं तो लेखक अंत तक पूरे निश्चित नहीं होते, लेकिन जितने होते हैं, उसमें लगा कि जो घटना इतनी नाकाबिले बर्दाश्त है, उसी की कहानी कहते हुए उससे बचकर कहां जाएंगे?

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