मनोज बाजपेयी की ‘घूसखोर पंडत’ का विवाद सिर्फ एक टाइटल का नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की पुरानी विडंबना को उजागर करता है. सवाल ये नहीं कि नेगेटिव किरदार क्यों हैं, सवाल ये है कि जातिगत पहचान के साथ उन्हें देखने में असहजता अब क्यों बढ़ गई है.
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