तमिलनाडु के इतिहास में जैन और बौद्ध दर्शन का गहरा प्रभाव था, लेकिन ये दर्शन जीवन में उत्साह और रंग की कमी के कारण नीरस हो गए थे. इस खालीपन को भरने के लिए नयनमार और आलवार संतों ने भक्ति आंदोलन की शुरुआत की, जिसने शिव और विष्णु की भक्ति को आम जनता तक पहुंचाया.
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