व्यंग्य: नहाने वालों, अवैज्ञानिक हठ त्यागो, प्रताड़नाओं से बचा लो इस माया-काया को…

स्नान को टालना मुझे राहत देता है. पूस में नहाने के लिए मुझे जेठ को याद करना पड़ता है. याद करना पड़ता है पीठ की घमोरियों को, बारिश के बाद की उमस को, पिघलते तारकोल को, ग्लूकोज का विज्ञापन, अखबार में छपी दुपट्टे से चेहरा ढकी लड़की की तस्वीर, गेहूं के खेत, सहारा की रेत और सूर्य के प्रकाश की 8 मिनट 20 सेकेंड की उस लंबी यात्रा को. नहाते हुए मैं पृथ्वी से बुध हो जाना चाहता हूं.

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