इसी व्यवस्थित भीड़ के बीच, संगम घाट पर खड़े-खड़े मेरी नजर एक छोटे से समूह पर पड़ी. न कोई शोर, न कोई विशेष सुरक्षा घेरा, न कोई घोषणा. कुछ शिष्य, साधारण वस्त्र और शांत चाल. पहले तो लगा कि कोई सामान्य संत होंगे, लेकिन थोड़ी ही देर में पता चला- ये पुरी के शंकराचार्य हैं.
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