बेघर…युवा…औरत: ‘हर रात नया नर्क लेकर आती है, कोई चेहरे पर धार छोड़ता है, कोई जबर्दस्ती करता है…’

पुराने-दान में मिले कपड़े, जो साइज में कई गुना बड़े या छोटे हों…उलझकर जूट बन चुके बाल… पैसे या खाना देते हुए हिकारत-घुली-दया… और अनाथ का पुछल्ला…यही मेरी पहचान थी. कालका जी मंदिर के आगे पली-बढ़ी. बचपन में मुझे बस भूख और सर्दी-गर्मी समझ आती थी. उम्र बढ़ी तो इसमें डर शामिल हो गया. रात का. लोगों का. अनचाहे चली आई नींद का.

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